“Such is the grace in the season of bloom, The garden's builder casts each wall-brick in a flower's mould.”
नज़ाकत बस इतनी है कि फूलों के मौसम में बाग़ के वास्तुकार ने बाग़ की दीवार की ईंट को फूल के साँचे में ढाल दिया है।
है नज़ाकत बस कि फ़स्ल-ए-गुल में मेमार-ए-चमन, क़ालिब-ए-गुल में ढली है ख़िश्त-ए-दीवार-ए-चमन। बसंत का मौसम इतना कोमल है कि बाग बनाने वाले ने दीवार की ईंटों को भी फूलों के सांचे में ढाल दिया है। नजा़कत का मतलब है कोमलता, फ़स्ल-ए-गुल यानी बसंत का समय, मेमार का अर्थ है मिस्त्री या वास्तुकार, और ख़िश्त का मतलब होता है ईंट। क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है कि दुनिया इतनी खूबसूरत और नाजुक है कि आप ज़मीन पर ज़ोर से कदम रखने से भी डरते हैं? ग़ालिब यहाँ इसी एहसास को पकड़ रहे हैं। वे एक ऐसे कारीगर की कल्पना कर रहे हैं जो बसंत की सुंदरता से इतना प्रभावित है कि वह बाग की दीवार बनाने के लिए साधारण पत्थर की ईंटों का इस्तेमाल नहीं करना चाहता। उसे लगता है कि इतने कोमल मौसम में एक कठोर दीवार अच्छी नहीं लगेगी। इसलिए वह हर ईंट को एक फूल की शक्ल दे देता है। यह कहने का एक प्यारा तरीका है कि जब हम खूबसूरती से घिरे होते हैं, तो हमारे काम और हमारे द्वारा बनाई गई चीज़ें भी उसी कोमलता को अपना लेती हैं। सोचिए कि आपने अपनी गोद में एक सोते हुए छोटे बच्चे को पकड़ा हुआ है; अचानक आप धीरे चलने लगते हैं, आपकी आवाज़ धीमी हो जाती है और आप दरवाज़ा भी बहुत धीरे से बंद करते हैं। उस बच्चे की कोमलता ने आपकी पूरी दुनिया को बदल दिया है। जब खूबसूरती हद से बढ़ जाती है, तो पत्थर भी फूलों की तरह सांस लेने लगते हैं।
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