ग़ज़ल
आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए
آئینہ دیکھ اپنا سا منہ لے کے رہ گئے
यह ग़ज़ल प्रेम के आगे अहंकार के टूटने और महबूब के आत्म-स्वीकृति भरे अहसास को खूबसूरती से दर्शाती है। इसमें शायर ने आशिक़ के समर्पण, विरह की तड़प और हुस्न के ग़ुरूर पर इश्क़ की जीत का बेहद पुरअसर चित्रण किया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए
साहब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था
आईने में अपना चेहरा देखकर वे शर्मिंदा होकर रह गए, जबकि पहले उन्हें किसी को दिल न देने पर कितना घमंड था।
2
क़ासिद को अपने हाथ से गर्दन न मारिए
उस की ख़ता नहीं है ये मेरा क़ुसूर था
संदेशवाहक को अपने हाथों से मत मारिए; इसमें उसकी कोई ग़लती नहीं है, यह सारा क़सूर मेरा था।
3
ज़ोफ़-ए-जुनूँ को वक़्त-ए-तपिश दर भी दूर था
इक घर में मुख़्तसर बयाबाँ ज़रूर था
दीवानगी की कमज़ोरी और तपिश के वक़्त घर का दरवाज़ा भी बहुत दूर लगता था; उस घर के अंदर ही यक़ीनन एक छोटा सा वीराना मौजूद था।
4
ऐ वाए-ग़फ़लत-ए-निगह-ए-शौक़ वर्ना याँ
हर पारा संग लख़्त-ए-दिल-ए-कोह-ए-तूर था
अफ़सोस कि चाहत भरी नज़र ने बेपरवाही बरती, वरना यहाँ का हर पत्थर कोह-ए-तूर के दिल का एक टुकड़ा था।
5
दर्स-ए-तपिश है बर्क़ को अब जिस के नाम से
वो दिल है ये कि जिस का तख़ल्लुस सुबूर था
यह वही दिल है जिसका उपनाम कभी सब्र और धीरज हुआ करता था, लेकिन आज बिजली भी इसके नाम से तपन और जलने का पाठ पढ़ती है।
6
हर रंग में जला 'असद'-ए-फ़ित्ना-इन्तिज़ार
परवाना-ए-तजल्ली-ए-शम-ए-ज़ुहूर था
इंतज़ार के फ़ितने में मुब्तिला असद हर तरह से जलता रहा, क्योंकि वह ज़ाहिर होने वाली शम्अ की तजल्ली का परवाना था।
7
शायद कि मर गया तिरे रुख़्सार देख कर
पैमाना रात माह का लबरेज़-ए-नूर था
कल रात चाँद का प्याला रोशनी से लबालब भरा था, शायद वह तुम्हारे रुख़्सार देखकर ही मर गया।
8
जन्नत है तेरी तेग़ के कुश्तों की मुंतज़िर
जौहर सवाद-ए-जल्वा-ए-मिज़्गान-ए-हूर था
जन्नत तुम्हारी तलवार से मारे गए लोगों की प्रतीक्षा कर रही है; तुम्हारी तलवार पर चमकता जौहर वास्तव में हूरों की पलकों का अक्स था।
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