गिर्या निकाले है तेरी बज़्म से मुझ को हाए कि रोने पे इख़्तियार नहीं है

“My weeping casts me out from your gathering; alas, that over my tears I hold no sway.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

मेरा रोना मुझे तुम्हारी महफ़िल से बाहर निकाल रहा है, और अफ़सोस इस बात का है कि अपने रोने पर मेरा कोई वश नहीं है।

विस्तार

इस शे'र में आशिक़ की लाचारी और बेबसी का बड़ा ही दर्दनाक मंज़र है। वह महबूब की महफ़िल में बस उसकी एक झलक पाने के लिए ठहरना चाहता है, मगर दिल का ग़म इतना गहरा है कि आँसू रोके नहीं रुकते। महफ़िल की नज़ाकत रोने की इजाज़त नहीं देती, इसलिए ये बेक़ाबू अश्क ही उसे वहाँ से निकाले जाने का सबब बन जाते हैं। सबसे बड़ा अफ़सोस महफ़िल से बाहर होना नहीं, बल्कि यह है कि उसका अपने ही जज़्बातों और रोने पर कोई इख़्तियार नहीं रहा।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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