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ग़ज़ल

फ़िराक़ गोरखपुरी - शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़

फ़िराक़ गोरखपुरी - शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़

यह ग़ज़ल 'शाम-ए-ग़म' के माहौल में महबूब की नज़रों के नज़ाकत भरे अल्फ़ाज़ों को याद करने की बात करती है। शायर कहता है कि इस उदासी और ख़ामोशी में, बस उन नज़रों से जुड़ी बातों और रहस्यों को दोहराया जाए। यह इश्क़ के गहरे, बेचैन करने वाले और दर्द भरे लम्हों का चित्रण है।

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1
शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो बेख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो
शाम-ए-ग़म में उस नज़ाकत भरी निगाह के किस्से सुनाओ, क्योंकि मेरी बेख़ुदी बढ़ती जा रही है और मुझे राज़ की बातें जाननी हैं।
2
ये सुकूत-ए-नाज़, ये दिल की रगों का टूटना ख़ामुशी में कुछ शिकस्त-ए-साज़ की बातें करो
यह नखरे वाला सन्नाटा, दिल की नसों का टूटना, खामोशी में कुछ टूटे हुए कला के सुरों की बातें करो।
3
निकहत-ए-ज़ुल्फ़-ए-परीशां, दास्तान-ए-शाम-ए-ग़म सुबह होने तक इसी अंदाज़ की बातें करो
परीशां ज़ुल्फ़ की सजावट और गम की शाम की कहानी, सुबह होने तक इसी अंदाज़ की बातें करते रहो।
4
कूछ क़फ़स की तीलियों से छन रहा है नूर सा कुछ फ़िज़ा, कुछ हसरत-ए-परवाज़ की बातें करो
जैसे किसी पिंजरे की सलाखों से छनकर आ रही रोशनी हो, ऐसी कुछ हवा का अहसास, या उड़ान की तीव्र इच्छा के बारे में बात करो।
5
जिसकी फ़ुरक़त ने पलट दी इश्क़ की काया फ़िराक़ आज उसी ईसा नफ़स दमसाज़ की बातें करो
जिसकी बिछड़ने से इश्क़ का रूप ही बदल गया, आज उसी साँस दम तोड़ने वाले का ज़िक्र करो।
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