शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो
बेख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो
“Oh, tell me the tales of that coy gaze in the evening of sorrow, Tell me the secrets, for my intoxication grows.”
— फ़िराक़ गोरखपुरी
अर्थ
शाम-ए-ग़म में उस नज़ाकत भरी निगाह के किस्से सुनाओ, क्योंकि मेरी बेख़ुदी बढ़ती जा रही है और मुझे राज़ की बातें जाननी हैं।
विस्तार
यह शेर ग़म के माहौल में एक नज़रों के नशा और बेख़ुदी को बयां करता है। शायर फ़िराक़ गोरखपुरी कहते हैं कि ग़म की शाम में, उस नज़ाकत भरी निगाह की बातें करनी हैं। जैसे-जैसे बेख़ुदी बढ़ती जाती है, दिल के सारे राज़ खुलने को बेचैन हो जाते हैं। यह सिर्फ़ बात करने की नहीं, बल्कि दिल की गहराई को उगलने की तमन्ना है।
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