खुशा इशारा-ए-पैहम, जेह-ए-सुकूत नज़र
दराज़ होके फ़साना है मुख्तसर फिर भी
“What a subtle signal, what a silent gaze, It is a long tale, yet brief in its display.”
— फ़िराक़ गोरखपुरी
अर्थ
क्या प्यारा संकेत है, क्या खामोश नज़रों से, यह कहानी लंबी है, फिर भी संक्षिप्त है।
विस्तार
यह शेर अनकही बातों की गहराई को बयां करता है। शायर कहते हैं कि एक छोटा सा इशारा, या बस एक ख़ामोश नज़र.... वह इतना गहरा होता है कि उसमें एक पूरा फ़साना समा जाए। मतलब, जब लफ़्ज़ कम हों, लेकिन एहसास बहुत ज़्यादा हों। यह इशारा ही सबसे बड़ी दास्तान बन जाता है।
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