मुंतज़िर हैं दम-ए-रुख़्सत कि ये मर जाए तो जाएँ फिर ये एहसान कि हम छोड़ के जाते भी नहीं

“They wait for the parting breath, to leave once I have died; and yet confer this favor on me, claiming they never left my side.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

वे मेरे अंतिम समय का इंतज़ार कर रहे हैं कि मैं मर जाऊँ तो वे यहाँ से जाएँ, और फिर भी यह एहसान जताते हैं कि वे मुझे छोड़कर नहीं जा रहे हैं।

विस्तार

इस शेर में शायर ने महबूब की झूठी वफ़ादारी और दिखावे पर गहरा तंज़ किया है। महबूब आख़िरी घड़ी में सिरहाने इसलिए बैठा है कि बस आशिक़ की जान निकले और उसे छुटकारा मिले, मगर कमाल यह है कि वह इस बेरहम इंतज़ार को भी एक बड़ा एहसान बनाकर जता रहा है। यह उस तल्ख़ दर्द की तस्वीर है जहाँ किसी का पास होना भी हमदर्दी नहीं, बल्कि बेरुख़ी और मजबूरी बन जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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