था मिरा मुँह न क़ाबिल-ए-लब्बैक — दाग़ देहलवी
“My lips were never worthy to cry 'Here am I!', and yet, to me You showed the sacred Kaaba.”
अर्थ
मेरा मुँह इस क़ाबिल नहीं था कि मैं 'लब्बैक' (मैं हाज़िर हूँ) कह सकूँ, फिर भी तूने मुझको काबा दिखा दिया।
विस्तार
इस शेर में अपनी नाक़ाबलियत का गहरा अहसास और खुदा की बेइंतहा रहमत का इज़हार है। शायर बेहद आजिज़ी से कहता है कि उसकी ज़ुबान इतनी पाक या काबिल नहीं थी कि वह 'लब्बैक' (मैं हाज़िर हूँ) जैसी मुक़द्दस पुकार लगा सके, फिर भी रब ने अपने करम से उसे काबे का दीदार करा दिया। यह शेर हमें याद दिलाता है कि ईश्वरीय कृपा हमारी योग्यता देखकर नहीं, बल्कि देने वाले की असीम दयालुता से बरसती है।
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