“The promise of a meeting, O Dagh, is true indeed; yet let us see if on that day our heart too finds delight.”
ऐ दाग़, उनका मिलने का वादा तो सच है, मगर अब यह देखना है कि उस दिन हमारा दिल भी ख़ुश हो पाता है या नहीं।
दाग़ इस शेर में बड़ी नज़ाकत और शोख़ी से दिल की थकावट बयां कर रहे हैं। महबूब ने मुलाक़ात का पक्का वादा तो कर लिया है, और उस वादे पर शक भी नहीं है। मगर शायर को अंदेशा है कि इंतज़ार की चोटें खाए हुए उनके दिल में उस दिन सचमुच खुशी जागेगी भी या नहीं। कभी-कभी तड़प इतनी लंबी हो जाती है कि जब मुराद पूरी होने का वक़्त आता है, तो दिल खुशी महसूस करने का हौसला भी खो चुका होता है।
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