“Upon a single cup of wine my life now rests; / Little by little, how could I reduce it any less?”
मेरी ज़िंदगी अब सिर्फ़ एक प्याले शराब पर टिकी हुई है, अब धीरे-धीरे इससे भी कम क्या किया जाए?
यह शेर ग़ालिब के अंदाज़ में बेबसी और ज़िंदगी के नाज़ुक मोड़ को बड़ी नफ़ासत से बयां करता है। शायर कहता है कि उसकी समूची हस्ती अब महज़ एक प्याले शराब पर टिकी है, जो शायद उसके जीने का आख़िरी सहारा बन चुकी है। ऐसे में जब कोई उसे इस आदत को भी आहिस्ता-आहिस्ता कम करने की नसीहत देता है, तो वह लाचारी से पूछता है कि जो ज़िंदगी पहले ही आख़िरी कतरे पर टिकी हो, उसे भला और कितना घटाया जाए?
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