“Let me but seek and find you on the Plain of Reckoning; can a face so intimately known ever stay hidden?”
क़यामत के मैदान में बस एक बार मैं तुम्हें ढूँढ ही निकालूँ, क्योंकि भला कोई ऐसा चेहरा भी कभी छुप सकता है जो इतनी अच्छी तरह पहचाना हुआ हो?
शायर यहाँ क़यामत के मैदान की कल्पना कर रहे हैं, जहाँ रूहों की असीम भीड़ और अफ़रा-तफ़री होगी, लेकिन उनका दावा है कि वे अपने महबूब को ढूँढ ही निकालेंगे। जिस चेहरे को दिल ने इतनी शिद्दत और अपनापन से पहचाना हो, वह कायनात की सबसे बड़ी भीड़ में भी कभी ओझल नहीं हो सकता। यह शेर इश्क़ के उस गहरे यक़ीन को बयां करता है जो मौत और क़यामत के ख़ौफ़ पर भी भारी पड़ता है।
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