कोई फ़ित्ना ता-क़यामत न फिर आश्कार होता तिरे दिल पे काश ज़ालिम मुझे इख़्तियार होता

“No turmoil would ever arise again until the Day of Doom, / If only, O cruel one, I held sway over your heart.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

ऐ ज़ालिम! काश तुम्हारे दिल पर मेरा अख़्तियार (नियंत्रण) होता, तो प्रलय (क़यामत) तक फिर कोई फ़ित्ना या उपद्रव पैदा न होता।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ बड़ी नज़ाकत और शिकवे भरे अंदाज़ में महबूब की बेरुख़ी को दुनिया के सारे फसादों की जड़ बताता है। उसका कहना है कि अगर इस 'ज़ालिम' के दिल पर उसका थोड़ा भी बस चल जाता, तो वह उसे इतनी नर्मी और प्यार से भर देता कि क़यामत तक कोई बेचैनी या फ़ित्ना जन्म न लेता। यह महबूब की निष्ठुरता को बयां करने का एक खूबसूरत और गहरा शायराना अंदाज़ है, जहाँ दिल का चैन पूरे ज़माने के सुकून से जुड़ा हुआ है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.