“Neither am I Arabic nor am I Lahori, Neither am I Hindi nor am I Nagauri. Neither am I Hindu nor am I Turk of Peshawar, Neither do I belong to any single place.”
मैं न अरबी हूँ और न लाहौरी, न ही मैं हिंदी हूँ और न मैं नगाउरी। न मैं हिंदू हूँ और न ही मैं पेशावर का तुर्क; मैं किसी एक जगह का निवासी नहीं हूँ।
यह शेर बुल्ले शाह द्वारा कही गई एक गहन आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है। शायर यहाँ भाषा, भूगोल और धर्म की सीमाओं से परे होकर एक सार्वभौमिक पहचान बताते हैं। वे कहते हैं कि उनका निवास किसी विशेष स्थान या पहचान में नहीं है। उनका अस्तित्व तो उस 'नदाउन' में बसता है, जो शुद्ध, निर्लिप्त और संपूर्ण है। यह पंक्तियाँ हमें सिखाती हैं कि सच्ची आध्यात्मिकता किसी बाहरी बंधन से नहीं, बल्कि मन की आंतरिक स्वतंत्रता से आती है।
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