ग़ज़ल
इश्क़ दी नवीं नवीं बहार
عشق دی نویں نویں بہار
यह ग़ज़ल प्रेम और आध्यात्मिकता के विरोधाभास को दर्शाती है, जहाँ कवि सांसारिक प्रेम और धार्मिक अनुष्ठानों की निरर्थकता पर सवाल उठाता है। वह बताता है कि प्रेम की खोज में, वे धार्मिक ग्रंथों और पूजा-पाठ में इतनी व्यस्त हो गए कि उन्हें सच्चे प्रेम और वास्तविक आध्यात्मिक अनुभव से दूर कर दिया गया है। अंत में, यह सांसारिक आकर्षण और प्रेम की महत्ता को स्थापित करते हुए, एक प्रेममय जीवन जीने का संदेश देती है।
गीत सुनें
1
جاں میں سبق عشق دا پڑھیا
مسجد کولوں جیؤڑا ڈریا
بھج بھج ٹھاکر دوارے وڑیا
جتھے وجدے ناد ہزار
जां मैं सबक़ इश्क़ दा पढ़िया
मस्जिद कोलों जीउड़ा डरिया
भज भज ठाकुर दुआरे वड़िया
जित्थे वज्दे नाद हज़ार
मेरे दिल में मैंने इश्क़ का सबक सीखा, / मस्जिद से लेकर दरिया तक, राह बहुत विशाल है। / मंदिर से लेकर दरबार तक, संघर्ष बहुत बड़ा है, / जहाँ हज़ार ध्वनियाँ गूँजती हैं।
2
وید، قرآن پڑھ پڑھ تھکے
वेद, क़ुरआन पढ़ पढ़ थक्के
वेद और कुरान पढ़कर थक गए, माथे पर सजदे रगड़ दिए। न ताइरथ के रब् हैं, न मक्के के रब् हैं, जिस पर नूर और अंबर का तेज पाया।
3
پھوک مصلّٰی، بھن سٹ لوٹا
نہ پھڑ تسبیح، عصا، سوٹا
عاشق کہندے دے دے ہوکا
ترک حلالوں، کھا مُردار
फूक मुसल्ला, भंन सट्ट लोटा
ना फड़ तसबीह, असा, सोटा
आशिक़ कहन्दे दे दे होका
"तर्क हलालों, खा मुरदार"
फ़ोक मुसालेह, भुं सत लोटा। न परह तस्बीह, आसा, सोता। आशिक कहंदे दे दे होके, 'तर्क हलालन, खा मुर्दार।'
4
ہیر رانجھے دے ہو گئے میلے
بھولی ہیر ڈھونڈدی بیلے
رانجھن یار بغل وچ کھیلے
سرت نہ رہیا، سرت سنبھال
हीर रांझन दे हो गए मेले
भोली हीर ढूँढदी बेले
रांझण यार बग़ल विच खेले
सुरत ना रहिया, सुरत सम्भाल
हीर رانجھے سے مل گئی، جب भोली हीर ने उसे ढूंढा, तो रंझा ने उसकी बाँहों में खेलना शुरू कर दिया। वह न रह पाई और न ही अपने भावों को संभाल पाई।
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