लिख और ग़ज़ल क़ाफ़िए को फेर 'ज़फ़र' तू अब तब्अ' की दरिया की तिरी मौज-ज़नी है

“Write yet another ghazal, Zafar, and turn the rhyme anew; for the river of your poetic muse is now surging in full swell.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

ऐ ज़फ़र, तू क़ाफ़िया बदलकर एक और ग़ज़ल लिख, क्योंकि इस वक़्त तेरी तबियत के दरिया में मौजें उठ रही हैं।

विस्तार

इस शेर में ज़फ़र खुद को नया क़ाफ़िया बाँधकर एक और ग़ज़ल कहने का हौसला दे रहे हैं, क्योंकि उनकी रचनात्मकता इस वक़्त पूरे उफान पर है। उन्होंने अपनी तबीयत और कल्पना की तुलना एक ऐसे दरिया से की है जिसमें ज़ोरदार लहरें उठ रही हैं। जब दिल में ख़यालों का ऐसा सैलाब उमड़ रहा हो, तो भला क़लम कैसे रुक सकती है—बस शायरी अपने आप बहती चली जाती है।

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