“Why, in wild frenzy, wouldn't every single hair prick like a razor-sharp sting? The thorn of grief burrows within your mad lover in a manner entirely unique.”
दीवानगी के आलम में शरीर का हर रोंगटा तेज़ डंक की तरह क्यों न चुभे? आख़िर तेरे दीवाने के अंदर ग़म के कांटे की चुभन और पैठ बिल्कुल अलग ही तरह की है।
यहाँ शायर इश्क़ के ग़म और दीवानगी की उस हद को बयाँ कर रहे हैं, जहाँ दर्द सिर्फ़ दिल में नहीं रहता बल्कि पूरे जिस्म में फैल जाता है। वहशत के इस आलम में आशिक़ के बदन का एक-एक रोंगटा सुई या डंक की तरह चुभने लगता है। महबूब के ग़म का काँटा किसी आम काँटे जैसा नहीं है, बल्कि वह दीवाने के रूहानी वजूद को भीतर ही भीतर ऐसे कुरेदता है कि सारा वजूद दर्द का पैकर बन जाता है।
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