“Respite with this burning heart lasts but a single cry; like wild rue tossed upon the coals, leap not so wildly high.”
यहाँ दिल के जलने के साथ ज़िंदगी की मोहलत बस एक आवाज़ जितनी ही है, इसलिए आग पर पड़े हरमल (सपंद) के दानों की तरह इतना उछल-कूद मत करो।
मीर इस शेर में 'सपंद' यानी हरमल के दानों का ख़ूबसूरत रूपक बाँधते हैं, जो अंगारों पर पड़ते ही तड़पकर उछलते हैं और एक पल की आवाज़ के साथ राख हो जाते हैं। दिल की इस जलन के साथ हमारी ज़िंदगी की मुहलत भी बस एक चीख़ जितनी मुख़्तसर है। जब हमारा वजूद इतना ही नाज़ुक और चंद लम्हों का है, तो फिर इतनी बेचैनी, तकब्बुर और उछल-कूद किस लिए? यह शेर हमें ज़िंदगी की नश्वरता को समझकर ठहराव और आजिज़ी अपनाने की सीख देता है।
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