ऐ 'ज़फ़र' कुछ हो सके तो फ़िक्र कर उक़्बा का तू कर न दुनिया का तरद्दुद कार-ए-दुनिया सहल है

“O Zafar, take heed of the hereafter while you still may; fret not over worldly strife, for the affairs of this world pass easily away.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

ऐ ज़फ़र! अगर मुमकिन हो तो आख़िरत (परलोक) की चिंता करो; इस दुनिया की फ़िक्र मत करो, क्योंकि दुनिया के काम तो आसान और मामूली हैं।

विस्तार

ज़फ़र यहाँ खुद को आईना दिखाते हुए बड़े अपनेपन से समझाते हैं कि इंसान दुनिया की उलझनों और चिंताओं में बेवजह अपनी रूह को थका देता है। इस संसार के काम तो जैसे-तैसे पूरे हो ही जाते हैं, असली चिंता तो उस आख़िरत (परलोक) की होनी चाहिए जहाँ का सफ़र हमेशा का है। यह शेर हमें रोज़मर्रा की बेमायने भागदौड़ से हटकर ज़िंदगी के असली और रूहानी मक़सद की तरफ़ लौटने की सलाह देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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