चश्म-ए-क़ातिल मिरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन जैसी अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी

“The slayer's eye was ever my sworn enemy, yet never before was it so deadly as it has now become.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

माशूक़ की क़ातिल आँखें हमेशा से ही मेरी दुश्मन रही हैं, लेकिन जैसी जानलेवा वे अब हो गई हैं, पहले कभी ऐसी नहीं थीं।

विस्तार

उर्दू शायरी में महबूब की नज़र को अक्सर क़ातिल कहा गया है, जो घायल भी करती है और दीवाना भी बनाती है। शायर यहाँ बहुत सादगी से कह रहे हैं कि माशूक़ की निगाहें पहले भी उनकी जान की दुश्मन थीं, मगर अब उनमें जो बेरुख़ी या तीखापन आया है, वो पहले कभी न था। यह शेर उस दर्द को बयाँ करता है जहाँ महबूब की ज़रा सी बदली हुई नज़र भी आशिक़ के दिल पर बिजली बनकर गिरती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.