समंदर में रहता हूँ, एक तरह से मैं खुद समंदर हूँ, प्रसंगोपात्त बुलबुले की सूरत लेकर आया हूँ।
“I dwell within the ocean, in a way, I am the ocean too, Occasionally, I've emerged assuming a bubble's hue.”
— अमृत घायल
अर्थ
कवि कहता है कि वह समुद्र में रहता है और एक तरह से स्वयं समुद्र ही है, परंतु कभी-कभी वह एक बुलबुले का रूप धारण करके प्रकट होता है।
विस्तार
यह शेर अपनी पहचान और अस्तित्व के रहस्य को समझाता है। शायर कहते हैं कि मेरा मूल स्वरूप समंदर जितना विशाल और अनंत है, लेकिन इस समय मैं बस एक बुलबुले की तरह आया हूँ। इसका मतलब है कि हमारी बाहरी दिखावट कितनी भी क्षणिक क्यों न हो, हमारा असली 'मैं' तो हमेशा से, हमेशा रहेगा। कितना गहरा विचार है!
Comments
Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.
No comments yet.
