‘घायल’, हमें शुद्ध कविताएँ चाहिए,दासी के स्वांग में हों या रानी के स्वांग में।
“'Ghayal', we desire pure poems,Be they in a maid's guise or a queen's attire.”
— अमृत घायल
अर्थ
कवि 'घायल' कहते हैं कि उन्हें केवल शुद्ध कविताएँ चाहिएं, फिर चाहे वे एक दासी के रूप में हों या एक रानी के वेश में।
विस्तार
ये शेर बहुत गहरा है। शायर कह रहे हैं कि कला की पहचान, उसके वेश या रूप से नहीं होती। चाहे बात दासी के प्रेम की हो, या रानी के गर्व की... कविता का सार तो हमेशा 'शुद्ध' होना चाहिए। यह एक ऐसी बात है जो हर दौर में, हर कला में सच है।
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