फ़ुज़ूँ तर है कुछ इन दिनों ज़ौक़-ए-इस्याँ दर-ए-रहमत अब वा हुआ चाहता है

“These days, a greater relish for sin stirs within me; it seems the door of divine mercy is about to open wide.”

— अल्ताफ़ हुसैन हाली
अर्थ

इन दिनों गुनाह करने का शौक कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है, ऐसा लगता है जैसे अब ईश्वर की दया का दरवाज़ा खुलने ही वाला है।

विस्तार

शायर यहाँ एक अनोखा और गहरा अंदाज़ अपनाते हैं—कहते हैं कि आजकल गुनाह करने का शौक़ कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है, शायद इसलिए कि ख़ुदा की रहमत का दरवाज़ा खुलने ही वाला है। यह बात इंसान और परवरदिगार के बीच के लाड़ और बेबाक रिश्ते को दिखाती है, जहाँ गुनाह बगावत से नहीं, बल्कि ईश्वरीय क्षमा के दीदार की उम्मीद में होता है। यहाँ पश्चाताप के बजाय ख़ुदा की असीम दयालुता पर एक शायराना और गहरा भरोसा झलकता है।

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