ग़म-ए-रश्क को तल्ख़ समझे थे हमदम सो वो भी गवारा हुआ चाहता है

“We once deemed the grief of jealousy bitter, my friend; yet even that now seems ready to become bearable.”

— अल्ताफ़ हुसैन हाली
अर्थ

ऐ दोस्त, हम रश्क (ईर्ष्या) के ग़म को बहुत कड़वा समझते थे, लेकिन अब वह भी सहने योग्य होता जा रहा है।

विस्तार

शायर अपने अज़ीज़ दोस्त से दिल का हाल बयां करते हुए कहता है कि कभी महबूब को किसी और के साथ देखकर जो जलन या रश्क होता था, वह ज़हर की तरह कड़वा और असहनीय लगता था। मगर अब लगातार मिले दुखों ने दिल को इस मुक़ाम पर पहुँचा दिया है कि वही सबसे तीखा दर्द भी धीरे-धीरे आदत बन रहा है और सहने लायक लगने लगा है। यह शेर इस मार्मिक एहसास को दर्शाता है कि जब इंसान गम की इंतहा देख लेता है, तो सबसे बड़ी तड़प भी खामोश समझौते में बदल जाती है।

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