मिलना है आप से तो नहीं हस्र ग़ैर पर किस किस से इख़्तिलात बढ़ाया न जाएगा

“If reaching you depends upon the favor of strangers, with just how many rivals must one cultivate intimacy?”

— अल्ताफ़ हुसैन हाली
अर्थ

अगर आपसे मिलना दूसरों के ज़रिये ही मुमकिन है, तो इंसान आख़िर किस-किस से मेल-जोल और नज़दीकियाँ बढ़ाएगा?

विस्तार

इस शेर में शायर महबूब तक पहुँचने के लिए बनाए गए पहरों और बिचौलियों पर एक मीठा सा तंज कस रहा है। माशूक़ से मिलने की शर्त अगर ग़ैरों की रज़ामंदी पर टिकी हो, तो आशिक़ आख़िर किस-किस से झूठी दोस्ती और नज़दीकियाँ बढ़ाए? यह मोहब्बत में अपनी ख़ुद्दारी को बचाने और महबूब के बेरुखे तौर-तरीक़ों से पैदा हुई बेबसी का बड़ा ही ख़ूबसूरत इज़हार है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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