ग़ज़ल

ગવરાવ્યા જશ હરિના ગાઓ

ગવરાવ્યા જશ હરિના ગાઓ
अखा भगत· Ghazal· 6 shers

यह ग़ज़ल भगवान हरि की भक्ति पर ज़ोर देती है, उनके यश गाने और उनसे एकाकार होने को प्रोत्साहित करती है। यह बताती है कि अहंकार हमें सर्वव्यापी, सुंदर और हर जगह मौजूद ईश्वर को पहचानने से रोकता है, जो अंततः सभी शब्दों और विचारों से परे है।

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
ગવરાવ્યા જશ હરિના ગાઓ હરિના છો ને હરિના થાઓ;
हरि का यश गान करो, जैसा तुम्हें गवाया जा रहा है। तुम हरि के हो, अतः हरि के ही हो जाओ।
2
અહં કૃ તે અણછતા ન થયા છતા ધણીથી છે ટા રહ્યા.
अहंकार के कारण वे वास्तव में प्रकट नहीं हो पाए। परिणामस्वरूप, वे स्वामी से हमेशा दूर ही रहे।
3
છતો ધણી તું છબીલો જાણ જેની શોભે સઘળે વાણ;
हे प्रभु, तुम साक्षात् छबीले हो, यह जानो, जिसकी सुंदरता हर जगह शोभा देती है।
4
છતો ધણી છે વાણીરહિત છતો ધણી છે શબ્દાતીત;
फिर भी स्वामी वाणी से रहित है, फिर भी स्वामी सभी शब्दों से परे है।
5
એમ વાચ્ય અવાચ્ય જેને સબળું ઠર્યું અખા તેહનું કારજ સર્યું.
जिसके लिए वाच्य (व्यक्त) और अवाच्य (अव्यक्त) दोनों शक्तिशाली हो जाते हैं, अखा, उसका कार्य सिद्ध हो जाता है।
6
સાચો મારગ જે કોઇ લે મિથ્યા મારગ મૂકી દે ;
जो कोई सच्चा मार्ग अपनाता है, वह झूठे मार्ग को त्याग देता है।
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