“Yet the Master is without speech,Yet the Master is beyond all words;”
फिर भी स्वामी वाणी से रहित है, फिर भी स्वामी सभी शब्दों से परे है।
यह दोहा हमें बताता है कि ईश्वर, या हमारे प्रभु, हर जगह मौजूद हैं। वे हमारे आसपास ही हैं। फिर भी, उनकी उपस्थिति को हम अपनी आम बोलचाल या शब्दों से पूरी तरह समझ नहीं सकते। दोहा कहता है कि प्रभु 'वाणी रहित' और 'शब्दातीत' हैं। इसका अर्थ है कि परम सत्य और ईश्वर का वर्णन करने में हमारी भाषाएँ और शब्द अपर्याप्त हैं। यह हमें सिखाता है कि ईश्वर को केवल शब्दों या शास्त्रों में ही नहीं, बल्कि उन अनुभवों में भी खोजना चाहिए जो भाषा से परे हैं, एक ऐसे सार को पहचानना चाहिए जिसे बोला नहीं जा सकता बल्कि महसूस किया जा सकता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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