ग़ज़ल

સમજુ ઘણાં પણ શ્વાનનો સંગ

સમજુ ઘણાં પણ શ્વાનનો સંગ
अखा भगत· Ghazal· 6 shers

यह ग़ज़ल, "अखा भगत 34", 'आसुरी कुत्तों' के बुरे प्रभाव के प्रति चेतावनी देती है और कामना-रहित भक्ति की वकालत करती है। यह बताती है कि आशा या निजी इच्छा से प्रेरित भक्ति हानिकारक है, जबकि ऐसी आकांक्षाओं से मुक्त भक्ति सफलता की ओर ले जाती है और अद्वैत सत्य की प्राप्ति कराती है, जहाँ आत्मा निराकार ब्रह्म में विलीन हो जाती है।

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लिपि व अर्थ
1
સમજુ ઘણાં પણ શ્વાનનો સંગ વણટે વે જેમ વણસે રંગ;
अनेक बुद्धिमान व्यक्ति भी कुत्तों जैसी संगति से भ्रष्ट हो जाते हैं, जैसे कोई शुद्ध रंग दाग लगने से खराब हो जाता है।
2
અખા આસુરી કૂ તરાં જાણ આશાની ભક્તિ મોટી હાણ.
अखा, उन्हें आसुरी स्वभाव का समझो। इच्छाओं की भक्ति (पूजा) एक बड़ी हानि है।
3
નિરાશી ભક્તિ જે કોઈ કરે તેનું સેજે કારજ સરે;
जो कोई निस्वार्थ भक्ति करता है, उसके कार्य सहजता से पूरे हो जाते हैं।
4
સ્વરૂપ તે અરૂપે અદ્વૈત થાય દ્વૈતાદ્વૈતનો લેશ જ જાય;
जब स्वरूप अरूप में अद्वैत हो जाता है, तब द्वैत-अद्वैत का लेशमात्र भी मिट जाता है।
5
આત્મ અનુભવે હોય પ્રકાશ અખા અહં કાર તે પામે નાશ.
आत्म-अनुभव से ही प्रकाश उत्पन्न होता है। हे अखा, इससे अहंकार का नाश हो जाता है।
6
અહં કૃ તિ તજી સ્મરણ કરો મન કર્મ વચન હરિવડે આદરો;
अहंकार का त्याग करो और उसे स्मरण करो; मन, कर्म और वचन से हरि का आदर करो।
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