ग़ज़ल

જેમ પ્રત્યક્ષ પોગર દીસે લોહમાંય

જેમ પ્રત્યક્ષ પોગર દીસે લોહમાંય
अखा भगत· Ghazal· 6 shers

यह ग़ज़ल धातु के पिघलने, उसे नया आकार देने और फिर उसे दर्पण में बदलने की रूपक का उपयोग करती है। शुरुआत में धातु का मूल स्वरूप स्पष्ट होता है, लेकिन जब वह दर्पण बन जाती है, तो उसका अपना रूप अदृश्य हो जाता है और वह अन्य चीज़ों को दर्शाती है। यह गहरा परिवर्तन दर्शाता है जहाँ स्वयं दुनिया को देखने का एक माध्यम बन जाता है, और इस प्रक्रिया में अपनी विशिष्ट दृश्य पहचान खो देता है।

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लिपि व अर्थ
1
જેમ પ્રત્યક્ષ પોગર દીસે લોહમાંય ગાળે ત્યારે ફીટી જાય;
जैसे लोहे में प्रत्यक्ष मैल दिखाई देता है, जब उसे पिघलाया जाता है तो वह दूर हो जाता है।
2
પાછો વળી ઘડાયે ઘાટ તેમનો તેમ પોગરનો ઠાઠ.
आकार को फिर से गढ़ा जा सकता है, फिर भी फूल की शोभा वैसी ही बनी रहती है।
3
તેજ લોહનું જ્યારે દર્પણ કરે શિકલ કરીને મશકલો ફરે;
जब लोहे का तेज एक दर्पण का रूप लेता है और आकृतियों को प्रतिबिंबित करता है, तो सारी परेशानियाँ दूर हो जाती हैं।
4
તેજ નીકળે પોગર ઢં કાય આપોપું દિસે તે માંય;
प्रकाश निकलता है, भले ही कली ढकी हो, उसका अपना सार उसमें प्रकट होता है।
5
અખા જ્ઞાનની એવી પેર કોટી જુગે કાં આજ આદે ર્ય.
अखा, ज्ञान की ऐसी ही रीति है; यह करोड़ों युगों पहले से हो या आज से, अनादि काल से विद्यमान है।
6
લોહ ગળતે દીસે પોગર ગળ્યા ઘાટ થાતાં તે પાછા વળ્યા;
लोहा पिघलता हुआ दिखता है और उसकी अशुद्धियाँ गल जाती हैं। जब उसे कोई आकार दिया जाता है, तो वह अपनी पूर्व अवस्था में लौट आता है।
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