અખા ગુરુ શું મૂકે પાર જેના શિષ્ય ગદર્ભ ને ગુરુ કું ભાર.

“Akha, how can a guru lead one across, when disciples are donkeys and the guru bears the burden.”

— अखा भगत
अर्थ

अखा प्रश्न करते हैं कि गुरु कैसे किसी को पार लगा सकता है, जब शिष्य गधे हों और गुरु को ही उनका भार उठाना पड़े।

विस्तार

यह दोहा कवि संत अखा द्वारा लिखा गया है, जो गुरु और शिष्य के संबंध पर एक गहरा सवाल उठाता है। अखा पूछते हैं, "कोई गुरु आपको भवसागर से पार कैसे लगा सकता है?" और इसका उत्तर अगली पंक्ति में देते हैं: "यदि शिष्य गधे जैसा हो, जो सीखने को तैयार न हो या ज्ञान का बोझ उठाने को इच्छुक न हो, और गुरु स्वयं एक बोझ बन जाए।" अखा इस बात पर ज़ोर देते हैं कि आध्यात्मिक प्रगति एकतरफा नहीं होती। गुरु का मार्गदर्शन अमूल्य है, लेकिन शिष्य की ईमानदारी, ग्रहणशीलता और बदलने की इच्छा उतनी ही महत्वपूर्ण है। शिष्य की सक्रिय भागीदारी के बिना, कोई भी गुरु उसे आत्मज्ञान तक नहीं ले जा सकता। यह आध्यात्मिक यात्रा में साझा जिम्मेदारी को दर्शाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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