તીરથ ફરી ફરી થાકયા ચરણ, તોય ન પોહોંચ્યો હરિને શરણ.

“My feet grew weary from countless pilgrimages,Yet still, I found no refuge at Hari's gates.”

— अखा भगत
अर्थ

बार-बार तीर्थयात्राएँ कर-कर के मेरे चरण थक गए, फिर भी मैं हरि की शरण में नहीं पहुँच सका।

विस्तार

यह दोहा एक गहरा आध्यात्मिक सत्य बताता है। इसमें कहा गया है कि आपके पैर अनगिनत तीर्थयात्राएँ करके, दूर-दूर के पवित्र स्थानों पर जाकर थक सकते हैं, लेकिन फिर भी आप भगवान की सच्ची शरण में नहीं पहुँच सकते। यह हमें विनम्रता से याद दिलाता है कि सच्ची भक्ति केवल शारीरिक यात्राओं या बाहरी अनुष्ठानों के बारे में नहीं है। इसके बजाय, यह आंतरिक यात्रा, हार्दिक संबंध और ईश्वर के प्रति सच्चे समर्पण के महत्व पर जोर देता है। सच्ची आध्यात्मिक शांति और ईश्वर से निकटता भीतर से आती है, न कि केवल बाहरी कार्यों से।

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