वो जानते हैं ग़ैर मिरे घर में है मेहमाँ — अकबर इलाहाबादी

वो जानते हैं ग़ैर मिरे घर में है मेहमाँ आएँगे तो मुझ पर कोई एहसाँ न करेंगे

“They know full well the rival is a guest inside my home; even if they come, it is no favor conferred on me.”

— अकबर इलाहाबादी

अर्थ

वे जानते हैं कि ग़ैर (रक़ीब) मेरे घर में मेहमान है, इसलिए यदि वे आएँगे भी तो मुझ पर कोई एहसान नहीं करेंगे।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ का एक गहरा और चुभता हुआ तंज़ छिपा है। वह जानता है कि उसके घर में इस वक़्त उसका 'रक़ीब' मेहमान बनकर बैठा है, और महबूब भी इस बात से वाक़िफ़ है। इसलिए अगर महबूब अब उसके घर आता भी है, तो यह आशिक़ पर कोई मेहरबानी या प्यार नहीं होगा, बल्कि उस ग़ैर की मौजूदगी का खिंचाव होगा। यह उस बेबसी को बयान करता है जहाँ महबूब का दीदार भी अब दिल को कोई सुकून नहीं दे सकता।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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