क्यूँ शुक्र-गुज़ारी का मुझे शौक़ है इतना — अकबर इलाहाबादी

क्यूँ शुक्र-गुज़ारी का मुझे शौक़ है इतना सुनता हूँ वो मुझ पर कोई एहसाँ न करेंगे

“Why am I possessed by such an urge to render gratitude, / When I hear that they intend to bestow no favor upon me?”

— अकबर इलाहाबादी

अर्थ

मुझे आभार जताने की इतनी तीव्र इच्छा क्यों है, जबकि मैं सुनता हूँ कि वे मुझ पर कोई एहसान नहीं करेंगे?

विस्तार

इस शेर में मोहब्बत का एक बहुत ही नाज़ुक और तंज़िया (व्यंग्यात्मक) पहलू छुपा है। शायर खुद से ही सवाल कर रहा है कि मुझे उनका शुक्रिया अदा करने की इतनी जल्दी क्यों है, जबकि ख़बर यह है कि वो मुझ पर कोई करम या मेहरबानी करने वाले ही नहीं हैं। दरअसल, आशिक़ के दिल में महबूब की बेरुखी भी इतनी प्यारी लगती है कि वो उसके इंकार को भी एक नेमत मानकर शुक्रगुज़ार होना चाहता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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