अफ़्लाक तो इस अहद में साबित हुए मादूम अब क्या कहूँ जाती है मिरी आह कहाँ तक

“The celestial spheres in this age are proven to be mere void; now who can tell how far my sigh ascends?”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

इस ज़माने में तो आसमानों का अस्तित्व ही ख़त्म या शून्य साबित हो चुका है, अब मैं क्या कहूँ कि मेरी आह कहाँ तक जाती है।

विस्तार

पुरानी शायरी में माना जाता था कि आशिक़ की दर्द भरी आह आसमानों की छत को छू लेती है। मगर शायर नए ज़माने की बात करते हुए कहता है कि अब तो साबित हो चुका है कि आसमान कोई ठोस छत नहीं, बल्कि एक असीम खाली शून्य है। ऐसे में जब रोकने के लिए कोई हद ही नहीं बची, तो शायर सोच में है कि उसके दिल से निकली बेइंतहा आह अब इस अनंत विस्तार में कहाँ तक जाएगी।

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