अगरचे मैं रिंद-ए-मोहतरम हूँ मगर इसे शैख़ से न पूछो कि उन के आगे तो इस ज़माने में सारी दुनिया जहन्नमी है

“Though I may be a respected libertine, ask not the pious Sheikh of this; for in his sight, in this day and age, all the world is bound for hell.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

हालाँकि मैं एक सम्मानित रिंद (मस्त-मौला/शराबी) हूँ, लेकिन यह बात शैख़ से मत पूछना, क्योंकि उनकी नज़र में तो आज के दौर में पूरी दुनिया ही दोज़ख़ी (नरकगामी) है।

विस्तार

यहाँ शायर बड़े ही चुटीले अंदाज़ में दिखावे की धर्मपरायणता और कट्टरता पर तंज़ कसता है। वह कहता है कि भले ही वह एक मस्त-मौला और बा-इज़्ज़त 'रिंद' है, लेकिन उसकी शराफ़त की गवाही किसी कट्टर शैख़ से मत मांगिए। शैख़ साहब की नज़र में तो ख़ुद उनके सिवा पूरी दुनिया ही पापी और जहन्नुम की हक़दार है, इसलिए उनके फ़ैसले की कोई क़ीमत नहीं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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