“Even in the Sheikh's assembly, the poor man finds no heed; for the sake of faith itself, to seek the world became a need.”
धर्मगुरु (शैख़) की महफ़िल में भी किसी ग़रीब की कोई पूछ-परख नहीं होती, इसलिए धर्म (दीन) की ख़ातिर भी इंसान को दुनिया की दौलत माँगनी पड़ी।
इस शेर में शायर ने धार्मिक दिखावे और समाज के खोखलेपन पर बड़ा गहरा और तीखा तंज़ किया है। वे कहते हैं कि जहाँ रूहानियत और सादगी की कद्र होनी चाहिए थी, उस शैख़ की महफ़िल में भी मुफ़्लिस की कोई पूछ नहीं होती क्योंकि दुनिया सिर्फ़ दौलत को सलाम करती है। यह कैसी कड़वी विडंबना है कि अपने दीन और आत्मसम्मान को बचाए रखने के लिए भी इंसान को उसी दुनियावी दौलत के पीछे भागना पड़ता है, जिससे दूर रहने की सीख दी जाती है।
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