दिल भी हाज़िर सर-ए-तस्लीम भी ख़म को मौजूद कोई मरकज़ हो कोई क़िबला-ए-हाजात तो हो

“The heart is offered, the head bowed low in submission; if only there were a center, an altar for all desires.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

दिल भी पेश है और सिर भी झुकने के लिए तैयार है, बस कोई ऐसा केंद्र या ज़रूरतों को पूरा करने वाला तो होना चाहिए।

विस्तार

शायर यहाँ समर्पण की एक अनोखी तड़प बयां कर रहा है—दिल न्योछावर होने को तैयार है और सिर सजदे में झुकने के लिए बेताब है। मगर दर्द यह है कि इस अगाध प्रेम और भक्ति को दिशा देने वाला कोई केंद्र, कोई अपना ठिकाना या 'क़िबला' ही नहीं मिल रहा। यह शेर उस बेचैनी की दास्तान है जहाँ इंसान अपना सब कुछ लुटाने को तैयार है, मगर सामने कोई ऐसा महबूब या मक़सद ही नहीं जो इस वफ़ा का हक़दार बन सके।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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