“I am bewildered how to voice my heart's desire, for from their side they never let the rival stir.”
मैं हैरान हूँ कि अपनी दिली तमन्ना किस तरह ज़ाहिर करूँ, क्योंकि वे अपने पास से रक़ीब (दुश्मन) को हटने ही नहीं देते।
इस शेर में एक बेबस आशिक़ का दर्द और हल्की सी लाचारी साफ़ झलकती है। वह अपने दिल का हाल महबूब के सामने रखना चाहता है, मगर तन्हाई का कोई पल ही मयस्सर नहीं आता क्योंकि महबूब अपने 'दुश्मन' यानी रक़ीब को एक लम्हे के लिए भी अपने पास से हटने नहीं देते। यह उस तकलीफ़देह जलन और बेरुख़ी की तस्वीर है, जहाँ अपने प्यार का इज़हार करने की ख़्वाहिश रक़ीब की मौजूदगी के पहरे में घुट कर रह जाती है।
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