“Dreadful is the hour of death's last agony—God grant refuge! / It is a moment far more harrowing than the Day of Judgment itself.”
प्राण निकलने (नज़अ') का समय बहुत बुरा और कठिन होता है, ईश्वर अपनी पनाह में रखे; वह ऐसा समय होता है जो क़यामत से भी बढ़कर कष्टदायी होता है।
इस शेर में शायर 'नज़्अ' यानी मौत की आखिरी हिचकी और रूह निकलने के दर्दनाक लम्हे का ज़िक्र कर रहे हैं। यह घड़ी इतनी खौफनाक और बेचैन करने वाली होती है कि इंसान बेइख्तियार खुदा से पनाह माँगने लगता है। शायर ने इस निजी अंत को 'क़यामत' से भी बड़ा बताकर यह गहराई दिखाई है कि जब किसी का अपना वजूद मिट रहा हो, तो वह दर्द पूरी कायनात के खत्म होने से भी कहीं ज़्यादा भारी लगता है।
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