दामान-ए-कोह में जो में डाढ़ मार रोया
इक अब्र वाँ से उठ कर बे-इख़्तियार रोया
“In the curtain of the mountain, who cried with a mournful cry? / From a single cloud, he rose up and cried helplessly.”
— میر تقی میر
معنی
پہاڑ کے دامن میں جو رونا رو رہا تھا، ایک بادل سے اٹھ کر بے اختیار رویا۔
تشریح
मीर तक़ी मीर ने रोने के दो पहलू बयान किए हैं। एक है दिखावटी, ज़ोर-ज़बरदस्ती का ग़म; और दूसरा है वो सहज, बे-इख़्तियार ग़म जो किसी बादल की तरह बस टपक आता है। असली दर्द हमेशा दिखावे से दूर, दिल की गहराई में होता है।
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