जल्वा-पैरा हो शाहिद-ए-मा'नी जब ज़बाँ सूँ उठे नक़ाब-ए-सुख़न

“May the beloved of inner meaning reveal her splendor, when from the tongue is lifted the veil of speech.”

— वली दकनी
अर्थ

अर्थ रूपी प्रियतम तब अपना जलवा दिखाए, जब ज़बान से शब्दों या कलाम का पर्दा उठ जाए।

विस्तार

शायर यहाँ बहुत ख़ूबसूरत ख़याल पेश करते हैं कि बात का गहरा अर्थ या रूहानी सच एक हसीन महबूब की तरह है, जो लफ़्ज़ों के नक़ाब में छिपा हुआ है। हम जो बोलते हैं, वह अल्फ़ाज़ महज़ एक पर्दा हैं; असली हुस्न तो उस गहरे मफ़हूम में है जो ज़बान के ख़ामोश होने या इस पर्दे के हटने पर ही पूरी तरह चमकता है। यह शेर हमें याद दिलाता है कि शायरी का असल मक़सद सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ी नहीं, बल्कि छुपे हुए गहरे सच का दीदार कराना है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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