ग़ज़ल

ऐसी मूढ़ता या मन की

ایسی نادانی اس من کی
तुलसीदास· Pad· 4 shers

इस पद में कवि अपने मन की अज्ञानता और मूढ़ता पर गहरा खेद प्रकट करते हैं, जो श्रीराम की भक्ति रूपी सुरसरिता को त्यागकर सांसारिक तुच्छ सुखों रूपी ओस की बूंदों के पीछे भागता है। वे दर्शाते हैं कि भौतिक मोह-माया का पीछा करना धुएँ को बादल समझने जैसा है, जिससे तृप्ति के बजाय केवल निराशा और हानि मिलती है।

Source: Tulsi Granthavali, Part 2 (ed. Ramchandra Shukla, Kashi Nagari Pracharini Sabha) · HI

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लिपि व अर्थ
1
ऐसी मूढ़ता या मन की । परिहरि रामभगति सुरसरिता आस करत ओसकन की ॥
इस मन की ऐसी मूर्खता है कि यह राम की भक्ति रूपी गंगा नदी को त्यागकर ओस की बूंदों से तृप्ति पाने की आशा करता है।
2
धूमसमूह निरखि चातक ज्यों तृषित जानि मति घन की । नहिं तहँ सीतलता न बारि, पुनि हानि होति लोचन की ॥
जैसे प्यासा पपीहा धुएँ के समूह को बादल समझ बैठता है, पर वहाँ न तो शीतलता मिलती है और न ही जल, बल्कि उल्टा उसकी आँखों को ही नुकसान पहुँचता है।
3
ज्यों गच-काँच बिलोकि सेन जड़ छाँह आपने तन की । टूटत अति आतुर अहार बस छति बिसारि आनन की ॥
जैसे कोई मूर्ख बाज दर्पण जैसे फर्श पर अपने ही शरीर की परछाईं देखकर, भोजन के लोभ में अपने चेहरे को होने वाले नुकसान को भूलकर अत्यंत व्याकुल होकर उस पर झपट पड़ता है।
4
कहँ लौं कहौं कुचाल कृपानिधि जानत हौ गति मन की । तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पन की॥६०।
हे दया के सागर! मैं अपने बुरे आचरण का कहाँ तक बखान करूँ, आप तो मेरे मन की सारी दशा पहले से ही जानते हैं। हे प्रभु! तुलसीदास के इस असहनीय दुःख को हर लीजिए और अपने प्रण की लाज रखिए।
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