ग़ज़ल

चरन कमल बंदौं हरि राई

چرن کمل بندوں ہری رائے
सूरदास· Pad· 2 shers

इस पद में सूरदास जी भगवान श्रीहरि के कमलवत चरणों की महिमा और कृपा का गुणगान करते हैं। वे बताते हैं कि प्रभु की असीम अनुकंपा से असंभव भी संभव हो जाता है—लंगड़ा पर्वत लांघ सकता है, अंधा देखने लगता है और निर्धन राजा बन जाता है। इस करुणामयी सत्ता के प्रति कवि की अनन्य भक्ति और पूर्ण समर्पण का भाव यहाँ व्यक्त हुआ है।

Source: Sankshipt Sursagar (Indian Press, 1924) · HI

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
चरन कमल बंदौं हरि राई । जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै अंधे को सब कुछ दरसाई ॥
मैं प्रभु श्रीहरि के कमल सदृश चरणों की वंदना करता हूँ, जिनकी कृपा से लंगड़ा मनुष्य पर्वत लांघ जाता है और अंधे को सब कुछ दिखाई देने लगता है।
2
बहिरो सुनै मूक पुनि बोलै रंक चलै सिर छत्र धराई ॥ सूरदास स्वामी करुणामय बार बार बन्दौं तेहि पांई ॥
उनकी कृपा से बहरा सुनने लगता है, गूँगा फिर से बोलने लगता है और निर्धन सिर पर राजछत्र धारण करके चलने लगता है। सूरदास कहते हैं कि ऐसे करुणामय स्वामी के चरणों की मैं बार-बार वंदना करता हूँ।
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