दाँत यूँ चमके हँसी में बात उस मह-पारा के — शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

दाँत यूँ चमके हँसी में बात उस मह-पारा के मैं ने जाना माह-ए-ताबाँ पारा-पारा हो गया

“So gleamed the teeth in the laughter of that moon-fragment's speech, I fancied the radiant moon itself had shattered into shards.”

— शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

अर्थ

उस चाँद के टुकड़े जैसे महबूब की बात और हँसी में दाँत ऐसे चमके कि मुझे लगा जैसे चमकता हुआ चाँद टूट कर टुकड़े-टुकड़े हो गया हो।

विस्तार

कल्पना कीजिए एक ऐसे प्रिय की, जो चाँद जैसा सुंदर है। जब वह हँसकर बात करता है, तो उसके दाँत इतने चमकते हैं कि शायर मंत्रमुग्ध रह जाता है। उसे लगता है मानो चमकता पूरा चाँद ही टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया हो, और वही चमकते टुकड़े प्रिय के दाँत बन गए हों। यह किसी की मुस्कान की तारीफ़ करने का बहुत कोमल और प्यारा तरीका है। शायर कहता है कि यह सुंदरता इतनी अद्भुत है कि चाँद भी उसके सामने साबुत न रह सका। कहने का मतलब यह कि प्रिय की हँसी चाँद से भी बढ़कर रोशन है।

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