बे-सबब ही जफ़ा का ज़ुल्म का ऐ ज़ौक़ — शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

बे-सबब ही जफ़ा का ज़ुल्म का ऐ ज़ौक़ दिया ही उस ने दिया नाम यार ने रोना

“Without a cause, O Zauq, the cruelty, the tyranny— my beloved gave me nothing but this gift of endless tears.”

— शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

अर्थ

बिना किसी कारण के, ऐ ज़ौक़, जफ़ा और ज़ुल्म करके मेरे यार ने मुझे सिर्फ़ रोना ही दिया।

विस्तार

इस शेर में ज़ौक़ प्रेम के दर्द को नरम शिकायत के साथ बयान करते हैं। वे कहते हैं कि बिना किसी वजह के उनके महबूब ने उन पर ज़ुल्म और सितम ढाया। और आख़िर में महबूब ने उन्हें दिया क्या? सिर्फ़ रोना, बस आँसुओं से भरी ज़िंदगी। यहाँ एक ख़ामोश उदासी है, मगर साथ ही एक तरह की स्वीकृति भी। आशिक़ यह भी नहीं पूछता कि ऐसा क्यों हुआ। वह बस इतना कहता है कि इस मोहब्बत का इकलौता तोहफ़ा रोना ही रहा। यह शेर बताता है कि प्रेम कैसे हमें ऐसा दर्द दे जाता है जिसके हम हक़दार नहीं थे, और फिर भी दिल उसी को थामे रहता है जिसने यह दर्द दिया।

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