हम हैं और साया तिरे कूचे की दीवारों का — शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

हम हैं और साया तिरे कूचे की दीवारों का काम जन्नत में है क्या ऐसे गुनहगारों का

“Here we are, and the shade of the walls of your lane— what would such sinners as us do in paradise's domain?”

— शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

अर्थ

हम हैं और तेरी गली की दीवारों का साया; हम जैसे गुनहगारों का जन्नत में भला क्या काम है।

विस्तार

शायर कहता है कि उसके पास बस इतना है, उसके महबूब की गली की दीवारों की छाँव। वही तंग गली उसकी पूरी दुनिया है, उसका सुकून और उसका घर। फिर वह खुद पर मुस्कुराते हुए कहता है कि उस जैसे इंसान का जन्नत में क्या काम? वह तो एक गुनहगार है, एक आशिक़ जिसने अपनी ज़िंदगी इन दीवारों से लिपटकर गुज़ारी। जन्नत का वादा उसके लिए कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि उसकी जन्नत तो यहीं है, महबूब के दर की छाँव में। यह प्यार का एक नाज़ुक इक़रार है कि सच्ची मोहब्बत को किसी इनाम की ज़रूरत नहीं। जो इश्क़ में खोया है, उसके लिए महबूब की गली ही काफ़ी है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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