“I hear much talk of her slender waist, yet nowhere can it be found; they speak of such a thing as my imagination cannot grasp.”
हम महबूब की पतली कमर की चर्चा तो सुनते हैं लेकिन वह कहीं दिखाई नहीं देती। लोग ऐसी बात कहते हैं जो मेरी समझ और ख़याल में ही नहीं आती।
उर्दू शायरी की क्लासिकी रिवायत में महबूब की कमर का इतना नाज़ुक होना कि वह नज़र ही न आए, एक बेहद दिलकश और शोख़ मज़मून है। शायर चुटकी लेते हुए कहता है कि लोग उसकी कमर की तारीफ़ तो बहुत करते हैं, मगर वह इतनी महीन और नदारद है कि ख़याल और तसव्वुर में भी नहीं समाती। यह हुस्न की नज़ाकत को हकीकत से परे ले जाकर एक हसीन पहेली बना देने का बड़ा प्यारा अंदाज़ है।
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