“Though a dervish unbound, detached from this worldly realm — what if certainty were attained, what if one were set free?”
भले ही तुम एक ऐसे दरवेश हो जो इस दुनिया से पूरी तरह बेपरवाह और अलग-थलग है, लेकिन अगर तुम्हें यक़ीन हासिल भी हो गया या तुम आज़ाद भी हो गए, तो इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है?
यह शेर एक ऐसे दरवेश की मनोदशा को छूता है जो दुनिया के तमाम झगड़ों और बंधनों से बेपरवाह होकर बहुत आगे निकल चुका है। उसने दुनियावी कशमकश छोड़ दी और शायद आत्मज्ञान या यक़ीन की मंज़िल भी पा ली, मगर फिर भी शायर पूछता है कि इस सब के बाद आख़िर हासिल क्या हुआ? यह सब कुछ त्याग देने और पूरी तरह आज़ाद हो जाने के बाद भी दिल के किसी कोने में बची रह जाने वाली एक ख़ामोश बेचैनी का इज़हार है।
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