“Let no pious ascetic rave like Mansur or Sarmad; O Jon, what matters if you became Qais, or what if Farhad?”
यदि कोई मंसूर और सरमद की तरह परहेज़गार बनकर बहकी-बहकी बातें करता हो, तो ऐ जौन, क्या फ़र्क़ पड़ता है कि तुम क़ैस (मजनूँ) बन गए या फ़रहाद बन गए?
इस शेर में जौन एलिया अपने चिर-परिचित अंदाज़ में इश्क़ और दीवानगी के रोमानी मिथकों को तोड़ते नज़र आते हैं। वे मंसूर और सरमद जैसे सूफ़ियों और क़ैस व फ़रहाद जैसे अमर प्रेमियों के त्याग पर तंज़ कसते हुए पूछते हैं कि आख़िर इस सारी बर्बादी का हासिल क्या हुआ? यहाँ कोई खोखला गर्व नहीं, बल्कि अपने ही दर्द और ज़िंदगी की निरर्थकता पर एक गहरी, उदास मुस्कान है।
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