कहीं ख़ुद हुआ शम्अ-ए-मजलिस-फ़रोज़ कहीं आपी परवाना हो कर जला

“Somewhere He became the candle illuminating the feast; somewhere turning into the moth, He burned Himself away.”

— शाह तुराब अली क़लंदर
अर्थ

कहीं वह स्वयं महफ़िल को रोशन करने वाली शमा बन गया, और कहीं ख़ुद ही परवाना बनकर जल गया।

विस्तार

यह शेर सूफ़ियाना फलसफ़े 'वहदत-उल-वजूद' यानी हर चीज़ में एक ही नूर देखने की बहुत ख़ूबसूरत मिसाल है। यहाँ शम्अ यानी महफ़िल को रोशन करने वाला माशूक़ और परवाना यानी इश्क़ में ख़ुद को फ़ना कर देने वाला आशिक़, दोनों असल में उस एक ही हक़ीक़त के रूप हैं। शायर बड़े प्यार से समझाता है कि दुनिया के इस पूरे रंग-रूप में जो जलता है और जो जलाता है, दोनों जुदा नहीं बल्कि एक ही नूर के दो पहलू हैं।

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