नहो मस्त अलस्त अब वो क्यूँकर भला जिसे बादा-ए-अदक़ा लवास्त मिला

“Why should he not be rapt in primal ecstasy, who has tasted the wine of the Primordial Covenant?”

— शाह तुराब अली क़लंदर
अर्थ

वह व्यक्ति भला सृष्टि के आरंभ के वादे की मस्ती में चूर क्यों न हो, जिसे उस आदि काल की रूहानी शराब मिल चुकी है।

विस्तार

यह शेर सूफ़ी परंपरा के उस पावन क्षण 'रोज़-ए-अलस्त' की याद दिलाता है, जब रूहों ने ख़ुदा के साथ मोहब्बत और समर्पण का पहला अहद यानी वादा किया था। शायर कहते हैं कि जिसने उस रूहानी अहद-ओ-पैमां की शराब का एक घूंट भी चख लिया हो, वह ज़िंदगी भर उसकी रूहानी मस्ती में क्यों न डूबा रहे? यह बयां करता है कि सच्ची ईश्वरीय मोहब्बत इंसान को दुनियावी होश-ओ-हवास से परे एक अमर आनंद में लीन कर देती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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